Sunday, November 25, 2018

एक मुल्क जिसका कोई वजूद नहीं है

एक भारी आवाज़ दियारबकर शहर की गलियों से उठी और पूरी फ़िज़ा में घुल गई. अगर आप को कुर्द ज़ुबान का एक भी लफ़्ज़ न आता हो, तो भी आवाज़ में घुला हुआ दर्द आप दिल से महसूस कर पाएंगे.

तुर्की का दियारबकर शहर, तुर्की कुर्दिस्तान की राजधानी कहा जाता है. ये तूफ़ानी नदी दजला के किनारे चौड़े पाट पर बसा है.

मेरा दियारबकर जाना गर्मियों के दिनों में हुआ. उस वक़्त भयंकर गर्मी पड़ रही थी. पूरा इलाक़ा मानो तपते सूरज की किरणों से पीला पड़ गया था. शहर की काली सड़कें तप रही थीं.

दिन के वक़्त तो पूरा शहर वीरान मालूम होता था. मगर शाम के वक़्त उछलते-कूदते शोर मचाते बच्चे, माहौल को हल्का बना देते थे. सिर पर दुपट्टा डाले हुए औरतें घर के काम निपटाने के बाद सामान ख़रीदने के लिए घर से निकलतीं और गाड़ियों में ढेर सारा सामान लाद कर लौटतीं.

जो भारी सी दर्द भरी आवाज़ मैंने सुनी थी, वो दियारबकर की गलियों में गूंज रही थी. काली ईंटों वाली इमारतों की क़तारों के बीच से आती वो आवाज़ मुझे एक बड़े से आंगन की तरफ़ खींच ले गई.

कुर्दिस्तान का दर्द भरा इतिहास बताती आवाज़

गलियों में अंजीर और शहतूत के पेड़ तपती धूप से राहत दे रहे थे. गलियों से गुज़रते हुए आवारा कुत्तों के भौंकने की आवाज़ और दुकानदारों की बांग सुनाई देती थी. कभी-कभार कार का हॉर्न भी बजता सुनाई देता था. इतनी आवाज़ों के बीच भी वो दर्द भरी आवाज़ अलग ही सुनाई दी थी. वो आवाज़ जो मुहब्बत, उम्मीद, ग़म और नाउम्मीदी को एक साथ बयां करती थी.

गलियों से गुज़रते हुए आख़िर में हम खुले से सहन में दाख़िल हुए. इसे माला देंगबेज यानी देंगबेज का मकान कहा जाता है. यहां आधुनिक दिखने वाला खुला सा आंगन था. जिसे अच्छे से तराश कर नया लुक दिया गया था. ये कम से कम एक सदी पुरानी इमारत थी. यहां पर ओपन-एयर थिएटर था.

जिस दर्द भरी आवाज़ का ज़िक्र हम कर रहे थे, वो इसी जगह से आ रही थी. और वो बयां कर रही थी कुर्दिस्तान का दर्द भरा इतिहास और इसके साथ क़िस्मत का क्रूर मज़ाक़. जिस इलाक़े को कुर्दिस्तान कहा जाता था, वो आज चार मुल्कों के बीच बंटा हुआ है. 1916 में अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों ने मिलकर कुर्दिस्तान को सीरिया, इराक़, तुर्की और ईरान में बांटने का गुपचुप समझौता कर लिया था. आज 2.5 से 3.5 करोड़ कुर्द बेमुल्क के बाशिंदे हैं. उनका अपना वतन नहीं है. लेकिन, अपनी ज़ुबान, संस्कृति, सभ्यता, परंपरा और साझा इतिहास की मदद से कुर्दों ने अपने वतन को अपने दिलों में ज़िंदा रखा है.

1923 में तुर्की की स्थापना से पहले कुर्द ज़ुबान और संस्कृति को अपनी पहचान बचाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है. तुर्की के शासकों का पूरा ज़ोर कुर्दों की अलग पहचान मिटाकर उन्हें कुर्द से तुर्क बनाने पर रहा है. क़रीब एक सदी से कुर्द लोग अपने अलग देश की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं.

अभी दो साल पहले यानि 2016 में कुर्द उग्रवादियों का तुर्की की सरकार के साथ हिंसक संघर्ष हुआ था. इस लड़ाई में पुराने दियारबकर शहर का बड़ा हिस्सा तबाह हो गया. इस इलाक़े में आज चल रहे निर्माण कार्य असल में उस जंग के ज़ख़्मों के निशान हैं. पुनर्निर्माण के लिए शहर के एक बड़े हिस्से की घेरेबंदी कर के उसे अलग कर दिया गया है.

No comments:

Post a Comment